10 साल में जंगलों ने अवशोषित किया ज्यादा कार्बन, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

भारत के जंगलों ने पिछले दस सालों में सालाना जितना कार्बन उत्सर्जित हुआ, उससे ज्यादा कार्बन अवशोषित किया है. एक रिसर्च के अनुसार सूखे जैसी चरम जलवायु घटनाओं के दौरान यह अवशोषण दर कम हो गई है. यह रिसर्च भोपाल के भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) के रिसर्चरों ने किया है. इस रिसर्च में जलवायु परिवर्तन के समाधान में पेड़-पौधों की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी जोर दिया गया है.

पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण के जरिए वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और श्वसन के द्वारा इसे फिर से वातावरण में छोड़ते हैं. IISER की पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर, धन्यलक्ष्मी पिल्लई ने बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषण और उत्सर्जन के बीच का संतुलन शुद्ध पारिस्थितिकी तंत्र विनिमय यानी NEE कहलाता है. जब यह पॉजिटिव होता है तो इसका मतलब है कि जंगलस्पति जितना कार्बन अवशोषित करती है उससे ज्यादा उत्सर्जित करती है. जब यह नेगेटिव होता है तो इसका मतलब है कि जंगलस्पति कार्बन का भंडारण कर रही है.

रिसर्च के अनुसार पिछले दशक में भारत के जंगलों ने सालाना उत्सर्जित कार्बन से ज्यादा कार्बन अवशोषित किया है. सालाना NEE का आकलन 38 करोड़ से 53 करोड़ टन कार्बन प्रति वर्ष रहा है. हालांकि रिसर्चकर्ता अपर्णा रवि ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की एक्सट्रीम घटनाओं के कारण इस अवशोषण में गिरावट आई है. उन्होंने जलवायु परिवर्तन के समाधान में पेड़-पौधों की भूमिका पर भी बल दिया.

वैज्ञानिकों ने यह भी रिसर्च किया कि भारत में किस प्रकार की वनस्पतियां कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने में मदद करती हैं. पिल्लई ने कहा कि भारत में सदाबहार जंगल प्रकाश संश्लेषण के जरिए बहुत ज्यादा कार्बन अवशोषित करते हैं. मध्य भारत में पर्णपाती जंगल ज्यादा कार्बन छोड़ते हैं क्योंकि इनकी श्वसन क्षमता ज्यादा होती है.

उन्होंने यह भी बताया कि ये हरी वनस्पतियां हर साल 21 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जित करती हैं, जो कार्बन स्रोत के रूप में काम करती हैं. हालांकि कृषि भूमि जंगलों के मुकाबले कम कार्बन अवशोषित करती है. देश में कृषि क्षेत्र का आकार बड़ा होने के कारण यह कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने में मदद करता है.